लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड को अवैध करार देते हुए नए बॉन्ड की खरीद पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने कहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड सूचना के अधिकार का उल्लंघन है, क्योंकि वोटर को पार्टियों की फंडिंग के बारे में जानने का हक है.
चुनावी बॉन्ड पर रोक के सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले से सबसे ज्यादा झटका भारतीय जनता पार्टी को लगने वाला है, क्योंकि इस बॉन्ड के जरिये देश में सबसे ज्यादा चन्दा उसी को मिल रहा था. आंकड़ों के मुताबिक तकरीबन 90 फीसदी राशि बीजेपी की ही झोली में जा रही थी. बाकी सभी दल महज 10 फीसदी में सिमटे हुए थे. इसलिए सत्ताधारी पार्टी पर इलेक्टोरल बॉन्ड्स के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में इसपर रोक लगाने की याचिका दायर की गई थी. जिसपर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने आज इसे असंवैधानिक बताते हुए इसपर रोक लगा दी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड सूचना के अधिकार का उल्लंघन है. वोटर्स को पार्टियों की फंडिंग के बारे में जानने का हक है. कोर्ट ने माना कि गुमनाम चुनावी बांड सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19(1)(ए) का उल्लंघन है. कोर्ट ने कहा है कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि सरकार के पास पैसा कहां से आता है और कहां जाता है.
CJI ने फैसला सुनाते हुए कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड के अलावा भी काले धन को रोकने के दूसरे तरीके हैं. अदालत ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड की गोपनीयता 'जानने के अधिकार' के खिलाफ है. राजनीतिक दलों की फंडिंग के बारे में जानकारी होने से लोगों को मताधिकार का इस्तेमाल करने में स्पष्टता मिलती है. कोर्ट ने आदेश दिए हैं कि बॉन्ड खरीदने वालों की लिस्ट सार्वजनिक की जाए.
यह बड़ा फैसला सुनाते हुए CJI जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि राजनीतिक दलों की फंडिंग की जानकारी उजागर न करना मकसद के विपरीत है. एसबीआई को 12 अप्रैल 2019 से लेकर अब तक की जानकारी सार्वजानिक करनी होगी. एसबीआई को ये जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी. आयोग इस जानकारी को लोगों के साथ्ज्ञ साझा करेगा. SBI को तीन हफ्ते के भीतर ये जानकारी देनी होगी.
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