नए साल में कराने जा रहे हैं बीमा, तो जान लीजिए यह सबसे जरूरी बात : जारी हुई सूची


क्लेम सेटलमेंट में कौन सी बीमा कंपनी सबसे आगे, कौन फिसड्डी : जानिए पूरा लेखा-जोखा


बीमा पॉलिसी लेते वक्‍त ध्‍यान में रखी जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण चीज क्लेम सेटलमेंट रेशियो होती है, जिससे आपको पता चलता है कि बीमा धारकों के दावों के निपटारे के मामले में उस कंपनी का रिकॉर्ड कैसा है.


बीमा नियामक भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने इसे लेकर अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी कर दी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में जीवन बीमा कंपनियों के क्लेम सेटलमेंट रेशियो में बीते वर्ष कमी आई है. वर्ष 2022-23 में इसका आंकड़ा घटकर 98.45% हो गया, जबकि इससे पिछले वर्ष 2021-22 में यह 98.64% था.


क्लेम सेटलमेंट रेशियो में यह कमी सरकारी और निजी दोनों ही क्षेत्रों की लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों में आई है. जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का रेशियो 98.84% से घटकर 98.52% ( नीचे) पर, जबकि प्राइवेट सेक्टर की इंश्योरेंस कंपनियों का क्लेम सेटलमेंट रेशियो 98.11% से घट कर 98.02% पर आ गया. 


लाइफ इंश्‍योरेंस के अलावा जनरल और हेल्‍थ इंश्‍योरेंस यानी सामान्य और स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र की बात करें, तो जनरल और हेल्‍थ इंश्‍योरेंस कंपनियों ने पॉलिसी की संख्या के आधार पर कुल 85.66% क्लेम का सेटलमेंट किया, जबकि क्लेम सेटलमेंट के तहत भुगतान की गई राशि में 71.62% की कमी आई. 


क्लेम सेटलमेंट रेशियो का निर्धारण बीमा कंपनियों की ओर से स्वीकृत किए गए क्‍लेम की कुल संख्या को बीमा कंपनी को प्राप्त हुए कुल क्‍लेम (दावों) की संख्या से विभाजित करके किया जाता है. उदाहरण के लिए, यदि जीवन बीमा कंपनी को कुल 100 डेथ क्लेम प्राप्त हुए और उनमें से 90 का निपटारा कर दिया गया, तो कंपनी का क्लेम सेटलमेंट रेशियो 90% होगा.


ऊंचा क्लेम सेटलमेंट रेशियो उस बीमा कंपनी द्वारा पॉलिसी की खरीदारी के समय की ग्राहकों से गई प्रतिबद्धताओं की मजबूती को प्रदर्शित करता है. बीमा विशेषज्ञों का मानना है कि यह इस बात का भी आश्वासन देता है कि जरूरत के समय कंपनी की ओर से अपना वादा निभाया जाएगा.


इसके साथ ही क्लेम सेटलमेंट रेशियो कंपनी द्वारा अपनाई जाने वाली अंडरराइटिंग प्रोसेस यानी क्‍लेम के निपटारे की प्रक्रियाओं की भी झलक देता है. अंडरराइटिंग किसी भी बीमा पॉलिसी के मूल्यांकन की प्रक्रिया है, जिसमें आवेदकों की ओर से दी गई मेडिकल और फाइनेंसियल जानकारियों की समीक्षा करके उनके जोखिम (रिस्क)  का निर्धारण किया जाता है.

 

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