अंबेडकर जयंती पर जानिए उस अंबेडकर को, जिसने भीमराव सकपाल को बना दिया 'अंबेडकर'


आज (14 अप्रैल) सारे देश में डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाई जा रही है, जिन्‍हें आदरपूर्वक 'बाबा साहब' और 'संविधान निर्माता' व 'संविधान शिल्‍पी' जैसे उपनामों से भी पुकारा जाता है। डॉ. अंबेडकर की जयंती पर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में उनके जीवन के कठिन संघर्ष, देश के संविधान के निर्माण व दलितों को शिक्षित व जागरूक करने में उनकी भूमिका की चर्चा व सराहना हर ओर की जा रही है। पर, बहुत कम ही लोगों को यह महत्‍वपूर्ण बात पता है कि डॉ अंबेडकर को गढ़ने वाले और उन्‍हें 'अंबेडकर' बनाने वाले व्‍यक्ति दरअसल उनके ब्राह्मण शिक्षक कृष्णाजी केशव अंबेडकर थे। उन्‍होंने न केवल भीमराव अंबेडकर को पढ़ाया, बल्कि उन्‍हें अपना उपनाम (सरनेम) 'अंबेडकर' भी दिया। ऐसा उन्‍होंने इसलिए किया, ताकि उस समय के रूढि़वादी समाज में प्रचलित जातिवाद और छुआछूत उनके होनहार छात्र भीमराव की शिक्षा और उन्‍नति में बाधक न बनने पाए। यह भीमराव के प्रति उनके प्रेम और अभिभावकत्‍व को भी प्रदर्शित करता है, जिसके चलते उन्‍होंने महार जाति के इस छात्र को मराठी ब्राह्मणों का सरनेम अंबेडकर प्रदान किया। 


इसलिए अंबेडकर जयंती पर आज उस "असली अंबेडकर" को याद करना भी बेहद जरूरी है, जिसने अंबेडकर को "अंबेडकर" बनाया।  इन्होंने ही उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने हेतु बडौदा रियासत के नरेश सयाजीराव गायकवाड़ महाराज से सिफारिश करके  अंबेडकर के विदेश जाने और वहां रहने, खाने व पढ़ाई के खर्च का इंतजाम कराया था। जिसके बाद वह डॉक्टर अंबेडकर कहलाए। वर्ना, अंबेडकर को कोई Scholarship नहीं मिली थी, जिसके बूते वो विदेश जाकर पढ़ते। सयाजीराव गायकवाड़ ने पिछड़े वर्ग के उत्‍थान के लिए काफी काम किया था। उन्‍होंने 1883 में इन लोगों के लिए अलग से कई स्कूल शुरू किए थे, क्‍योंकि इन्‍हें उस समय अछूत समझा जाता था, जिसके चलते स्‍कूलों में दाखिला मिलने और पढ़ाई करने में काफी दिक्‍कतें पेश आती थीं। ऐसा ही भीमराव अंबेडकर के साथ भी बचपन में हुआ था। 


विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद ‘राइटिंग्स एंड स्पीचेज ऑफ़ डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर’ के वॉल्यूम 17 के भाग एक में गायकवाड़ और डॉ. अम्बेडकर के बीच हुई बातचीत का अंश कुछ इस प्रकार है-


महाराजा: इन विषयों का अध्ययन करके आप क्या करेंगे?


भीमराव: इन विषयों के अध्ययन से मुझे अपने समाज की दयनीय स्थिति में सुधार के संकेत मिलेंगे और मैं उसी आधार पर समाज सुधार का काम करूंगा.


महाराजा: (हंसते हुए) लेकिन आप हमारी सेवा करने जा रहे हैं, है ना? फिर कैसे पढ़ेंगे, सेवा करेंगे और समाज सेवा भी करेंगे?


भीमराव: यदि परम पूज्य महाराज मुझे उचित अवसर देते हैं, तो मैं सब कुछ कर लूंगा.


महाराजा: मैं उसी आधार पर सोच रहा हूं. मैं आपको अमेरिका भेजने की सोच रहा हूं आप जाओगे?


भीमराव: हां सर.


महाराजा: अब आप जा सकते हैं. हमारे अकादमिक अधिकारी को छात्रवृत्ति के लिए विदेशी प्रस्तावित अध्ययन का एक आवेदन भेजें और मुझे तदनुसार सूचित करें.


इस बातचीत से स्‍पष्‍ट होता है कि अगर महाराजा गायकवाड डॉ: अंबेडकर की मदद न करते, तो उनके लिए विदेश जाकर कई वर्ष तक उच्‍च शिक्षा ग्रहण करना संभव न हो पाता। 


वास्‍तव में डॉ. अंबेडकर का जन्म से नाम भीमराव रामजी सकपाल था। उनके पिताजी ने स्कूल में उनका नाम भीमराव अम्बाडावेकर लिखवाया था। बाबासाहब के जीवन में उनके शिक्षक कृष्ण केशव आम्बेडकर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वह बाबासाहब की प्रतिभा को जानते थे। उन्होंने उनकी बहुत मदद की। यहां तक कि उन्हें अपना सरनेम तक दे दिया था।


गौरतलब यह है कि अंबेडकर और गायकवाड़ दोनों ही सवर्ण थे। इसके अलावा कोई बाध्यता न होने पर भी अंबेडकर को संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष और फिर भारत का पहला कानून मंत्री बनाने वाले नेहरू भी कश्मीरी ब्राह्मण ही थे। इसके अलावा डॉ. अंबेडकर के बीमारी के दिनों में उनसे विवाह कर उनकी देखभाल करने वाली भी एक ब्राह्मण महिला डॉ. शारदा कबीर थीं। डॉ. शारदा कबीर जब अम्बेडकर से मिलीं, तो उन्होंने जानलेवा बीमारियों से ग्रसित एक मरीज के रूप में डॉ. BR अम्बेडकर को जाना. उन्होंने 15 अप्रैल, 1948 को उनसे शादी की और अपना नाम बदलकर सविता अम्बेडकर रख लिया। इस बात का जिक्र भी डॉ. अंबेडकर के जीवन पर 1956 में लिखी धनंजय कीर किताब ‘डॉ. अम्बेडकर: लाइफ़ एंड मिशन‘ में मिलता है। 


अंबेडकर को याद करते वक्त उनके जीवन में अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण व सहयोगात्‍मक भूमिका निभाने वाली इन सवर्ण विभूतियों इन के योगदान को भुलाया नहीं जाना चाहिए।


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