अपनी गाड़ी को अगर सीएनजी या इलेक्ट्रिक वाहन में बदलवाने जा रहे हैं, तो बीमा कंपनी को बताना न भूलें, वर्ना रिजेक्ट हो जाएगा क्लेम. यदि आपके मन में भी यह आइडिया आ रहा है, तो याद रखिए कि इससे आपकी गाड़ी का बीमा खतरे में पड़ सकता है और वैध बीमा पॉलिसी के बिना किसी भी वाहन को कानूनन भारतीय सड़कों पर नहीं चलाया जा सकता है.
बीमा कंपनियां इस बात पर तो सहमत हैं कि कंवर्टेड दोपहिया वाहनों या कारों का बीमा किया जा सकता है, लेकिन उनका कहना है कि इसके लिए वाहन में परिवर्तन किए जाने की सूचना बीमा कंपनी को देना जरूरी है. एचडीएफसी ईआरजीओ जनरल इंश्योरेंस के अध्यक्ष (रिटेल बिजनेस) पार्थानिल घोष कहते हैं, "ऐसी स्थिति में जब कोई बीमाधारक बीमा कंपनी को सूचित करने में विफल रहता है और किसी दुर्घटना का शिकार हो जाता है, तो कंपनी दावा खारिज कर सकती है."
अगर आप पॉलिसी वर्ष के दौरान वाहन के ईंधन प्रकार में बदलाव करते हैं, तो भी कोई समस्या नहीं है. बीमा कंपनी नए वाहन की स्थिति दर्शाने पर आपकी पॉलिसी को अपडेट कर सकती है. पर इसके लिए बीमा कंपनी को सूचना देना जरूरी है, क्योंकि कार या दोपहिया वाहन के लिए शक्ति के स्रोत यानी सोर्स ऑफ पावर में बदलाव के कारण तकनीकी स्तर पर कई चीजें बदल जाती हैं.
डिजिट जनरल इंश्योरेंस के मोटर अंडरराइटिंग प्रमुख, आदित्य कुमार बताते हैं, “कार बीमा प्रीमियम विभिन्न कारकों के आधार पर तय किया जाता है, जिसमें ईंधन का प्रकार और वाहन के बीमाकृत घोषित मूल्य (आईडीवी) शामिल हैं. जब किसी कार को मूल उपकरण निर्माता (ओईएम) द्वारा प्रदान किए गए फॉर्म से संशोधित या परिवर्तित किया जाता है, तो बीमाकर्ता द्वारा उस वाहन पर कवर किए गए जोखिम का प्रकार बदल जाता है.
गाड़ी इस बदलाव की जानकारी बीमा कंपनी को न देने से क्लेम सेटेलमेंट यानी दावा प्रक्रिया के दौरान समस्याएं आ सकती हैं. बीमा कंपनियों को ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा है. फ्यूचर जेनराली इंश्योरेंस सॉल्यूशंस में मुख्य वितरण अधिकारी राघवेंद्र राव कहते हैं, "हालांकि फिलहाल हमारे सामने गाड़ी को इलेक्ट्रिक वाहन में बदलाव का अनुरोध करने वाले व्यक्तियों के ज्यादा मामले नहीं हैं, लेकिन ऐसे तमाम मामले सामने आए हैं, जिनमें उन पॉलिसियों पर क्लेम किए गए हैं, जिनमें पेट्रोल या डीजल कार तके सीएनजी किट लगाई गई और एक बीमा कंपनी के रूप में हमें सूचित नहीं किया गया."
सरकार से स्वीकृत किट ही लगाएं
बीमा कराने के लिए दो विकल्प
गाड़ी में सीएनजी या ईवी किट लगवाने पर आपको या तो मौजूदा वाहन बीमा पॉलिसी रद्द करनी होगी या नई पॉलिसी लेनी होगी. राव कहते देते हैं, “एक ईंधन प्रकार से दूसरे ईंधन में बदलवाने पर वाहन की लागत बदल जाएगी. यदि आप वर्ष के मध्य में यह बदलाव करा रहे हैं, तो आपके पास बीमा पॉलिसी को रिवाइज कराने या मौजूदा पॉलिसी को रद्द कर शेष अवधि के प्रीमियम का रिफंड लेने का विकल्प होता है. बीमा कंपनियों का कहना है कि मौजूदा पॉलिसी में बदलाव करने के बजाय नई पॉलिसी लेना कराना बेहतर है, क्योंकि बदलाव के परिणामस्वरूप वाहन में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं. जब एक वाहन को इलेक्ट्रिक वाहन में परिवर्तित किया जाता है, तो यह आमतौर पर जोखिम और कवरेज आवश्यकताओं का मूल्यांकन करने के लिए कई अंडरराइटिंग बदलावों से गुजरता है. इन परिवर्तनों में बैटरी प्रकार और स्थिति सहित इलेक्ट्रिक वाहन की विशिष्टताओं को समझने के लिए टेक्निकल जांच शामिल होती हैं. खासतौर पर अगर आप गाड़ी को इलेक्ट्रिक फॉर्मेट में बदल रहे हैं तो भारी बदलाव किए जाते हैं. इंजन आमतौर पर गाड़ी के सबसे महंगे हिस्सों में से होता है, इसमें बदलाव करने और इसे ईवी वाहन में बदलने से बीमा कवरेज पर असर पड़ सकता है.
बैटरी की लागत प्रीमियम बढ़ाती है
किसी गाड़ी को ईवी में बदलवाने से उसकी बैटरी की लागत काफी बढ़ जाती है, जिसके चलते वाहन का बीमा प्रीमियम बढ़ जाएगा. राव कहते हैं “मौजूदा ICE वाहन को इलेक्ट्रिक वेरिएंट में बदलने में लगभग 5-7 लाख रुपये का खर्च आता है. इसमें कम से कम 3-4 लाख रुपये तो बैटरी पर ही लगते हैं . ऐसे में ऐसे में बीमा प्रीमियम उस बैटरी के प्रकार और उसकी क्षमता पर निर्भर करेगा ”
थर्ड पार्टी बीमा का प्रीमियम भी अलग होता है
बीमा प्रीमियम के भीतर, दो अलग-अलग कवर होते हैं - एक आपके अपने वाहन को हुए नुकसान (स्वयं के नुकसान) के लिए होता है, और दूसरा सड़क पर किसी अन्य बाहरी वाहन को होने वाले नुकसान के लिए होता है, जिससे आपका वाहन (थर्ड पार्टी) को नुकसान पहुंचा सकता है. घोष कहते हैं “इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए मोटर थर्ड-पार्टी कवरेज प्रीमियम संबंधित ICE इंजनों की तुलना में 15 प्रतिशत तक कम होता है. इस प्रकार औसत थर्ड-पार्टी प्रीमियम कम से कम 10-12 प्रतिशत कम होता है.”
वारंटी पर भी पड़ता है असर
वाहनों में विशेष भागों के लिए अक्सर चार से पांच साल तक की वारंटी अवधि होती है. गाड़ी का मोडिफिकेशन या कंवर्जन कराने पर यह वारंटी खत्म हो सकती है. कुमार कहते हैं, ''यदि गाड़ी वारंटी पीरियड में है, तो वाहन निर्माता कंपनी से जांच करा लेनी चाहिए कि गाड़ी में कराए जा रहे बदलावों से वारंटी प्रभावित होगी या नहीं.'' दूसरी ध्यान देने वाली बात यह है कि मूल वाहन पर ली जाने वाली एक्सटेंडेड वारंटी भी मोडिफिकेशन या कंवर्जन से खत्म हो सकती है. ऐसे में आप अगर गाड़ी को ईवी में बदलवा रहे हैं, तो बैटरियों के लिए एक्सटेंडेड वारंटी लेने पर विचार कर सकते हैं. इसके लिए एक ऐड-ऑन कवर की आवश्यकता होगी जो बैटरी के लिए एक्सटेंडेड वारंटी होगा. बैटरियों के लिए ऐसे अतिरिक्त कवर धीरे-धीरे बीमा कंपनियों द्वारा लॉन्च किए जा रहे हैं.’’

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