चंद्रगुप्‍त के गुरु चाणक्‍य का इस वजह से हुआ था दुखद अंत : क्‍या आपको पता है इतिहास का यह राज़ !

  •  कम ही लोगों को पता है कौटिल्‍य की मौत की कहानी 


राजनीति की दुनिया में आज पार्टियां एक दूसरे को सियासी शह-मात देनें में जुटी हुई हैं। इसमें अपने विरोधी को परास्‍त करने के लिए चाणक्‍य नीति का सहारा लिया जाता है। पर, जिस चाणक्‍य की रणनीति और कूटनीति का आए दिन राजनीति की दुनिया में सहारा लिया जाता है, भारतीय इतिहास की उस विलक्षण हस्‍ती से से जुड़ा एक राज़ है, जिसे बहुत ही कम लोग जानते हैं। 

जी हां, हम बात कर रहे हैं महान आचार्य चाणक्‍य की मौत की।अतीत में हमारे देश की दशा-दिशा तय करने वाली इस चर्चित शख्सियत जिन्‍हे कौटिल्‍य के नाम से भी जाना जाता है, की मृत्‍यु के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्‍यों में कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती।  ऐतिहासिक संदर्भों में चाणक्य की मौत कैसे हुई, इसके बारे में दो किंव‍दंतियां प्रचलित हैं, पर दोनों के बारे में ही कोई ठोस साक्ष्‍य मौजूद नहीं हैं। 

चाणक्य का जीवन काल

चाणक्‍य की मौत से जुड़ी कहानियों से पहले आपको बता दें कि नंद वंश का विनाश कर मौर्य वंश की स्‍थापना में अहम भूमिका निभाने वाले चाणक्य का जन्म 375 ई शा पूर्व में हुआ था, जबकि उनकी मृत्यु 283 ईस्‍वी में हुई थी। चाणक्‍य ने मौर्य सम्राट चंद्रगुप्‍त मौर्य और उसके पुत्र बिन्‍दुसार के दरबार में अहम भूमिका निभाई थी। 

चाणक्य की मौत पर इतिहासकारों में मतभेद

पर चाणक्य की मौत कैसे हुई इतिहासकारों में इस विषय पर मतभेद है। इसकी वजह यह है मौर्य वंश का वा‍स्‍तविक संस्‍थापक माने जाने वाले इस अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति की मृत्‍यु के बारे में मौर्य कालीन या उसके बाद के किसी भी ऐतिहासिक ग्रंथ, अभिलेख या अन्‍य साक्ष्‍य में कोई स्‍पष्‍ट उल्‍लेख न होना। प्राचीन साहित्‍य में इस बारे में दो बातें पढ़ने को मिलती हैं, जो एतिहासिक उल्‍लेख के बजाय कहानियों जैसी ज्‍यादा लगती हैं। 

पहली कहानी षड्यंत्र की

चाणक्‍य की मौत से जुड़ी पहली कहानी के मुताबिक चंद्रगुप्‍त के गुरु चाणक्‍य की मौत उनके पुत्र बिन्‍दुसार के शासनकाल में चलने वाली दरबारी साजिशों के चलते हुई। कहा जाता है कि बिंदुसार भी अपने पिता चंद्रगुप्‍त की ही तरह चाणक्य की सलाह से  शांतिपूर्वक अपना साम्राज्य चला रहे थे। उनके दरबार में भी चाणक्‍य को वही सम्‍मान प्राप्‍त था, जैसा कि चंद्रगुप्‍त के समय में चाणक्‍य का रुतबा था। 

चाणक्‍य का यह दबदबा और चाणक्य-बिंदुसार का यह नजदीकी रिश्ता दरबार में कुछ मंत्रियों को बिलकुल पसंद नहीं था। इसीलिए वह किसी तरह दोनों को अलग करना चाहते थे। इसी के चलते इन चाणक्य के इन दुश्मनों ने मिलकर एक षड्यंत्र रचकर चाणक्य को जिंदा जला दिया था। जिससे चाणक्य की मौत हो गई। 

हालांकि इस बात का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता है। साथ ही इस बात पर आसानी से यकीन कर पाना मुश्किल है कि इतनी प्रखर बुद्धि और कूटनीति की गहरी समझ रखने वाला यह शख्‍स अपने ही प्रतिद्वंद्वियों की साजिश का इतनी आसानी से शिकार हो सकता था। 

दूसरी कहानी मन-मुटाव की 

दूसरी कहानी के मुताबिक चाणक्‍य से वैमनस्‍य रखने वो मंत्रियों ने सम्राट व चाणक्‍य के बीच दूरियां बढ़ाने के लिए बिंदुसार को यह बता दिया कि इसकी मां की मौत का कारण चाणक्य ही है। बिंदुसार को बताया गया कि चाणक्‍य के द्वारा ज़हर दिए जाने से उनकी मां की मौत हुई। तब से वह चाणक्‍य से खिन्‍न रहने लगे। इस किस्‍से के मुताबिक 

चाणक्य चंद्रगुप्त मौर्य के खाने में हर रोज थोड़ा थोड़ा मात्रा में जहर मिलाया करते थे ताकि चंद्रगुप्त का शरीर जहर के आदि हो जाए और उस पर किसी भी तरीके का जहर असर नहीं करें।

चाणक्य को यह डर था कि कहीं चंद्रगुप्त को किसी ने जहर देकर मार दिया और उनका साम्राज्य छीन तो क्या होगा ।इसीलिए चाणक्य चंद्रगुप्त मौर्य में रोज थोड़ा थोड़ा जहर मिलाया करते थे। एक दिन शहर मिला हुआ खाना चंद्रगुप्त मौर्य की पत्नी दुर्धरा ने खा लिया और उसकी मौत हो गई। इस बात की जानकारी से बिंदुसार को बहुत बड़ा झटका लगा और धीरे-धीरे चाणक्य और अनुसार की दूरियां बढ़ने लगी।  दूरियां इतनी बढ़ गई थी कि चाणक्य की दी गई सलाह अनुसार नहीं मानता था। चाणक्य भी धीरे धीरे समझ गए और उन्होंने एक दिन चुपचाप बिना बताए महल छोड़कर चले गए।

हालांकि कहानी के मुताबिक मौत के वक्‍त रानी दुर्धरा गर्भवती थी और जल्‍द ही  बिंदुसार का जन्म होने वाला था। ऐसे में चाणक्य ने तुरंत रानी का के गर्भ काट कर बिंदुसार को बाहर निकाल दिया और इस तरह चंद्रगुप्त का वंश बचा लिया था।चाणक्य के जाने के बाद बिंदुसार के महल एक दाई ने उसकी माँ के मौत का कारण बताया। तब बिंदुसार को अपनी गलती का एहसास हुआ। बिंदुसार ने चाणक्य को वापस में लाने के लिए कहा पर वे नहीं माने। महल छोड़ने के बाद से किसी जंगल में रहने चले गए और उन्होंने आजीवन वनवास का फैसला कर लिए और एक दिन उसी जंगल में उन्होंने प्राण त्याग दिए।


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