देश के प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद पर होने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने बीते दो दिनों में चुनाव आचार संहिता का खुल्लम खुल्ला गंभीर उल्लंघन किया है। इसके बावजूद चुनाव आयोग अपनी आंखों पर पट्टी बांधे बैठा है। चुनाव आयोग के इस पिलपिले रवैये को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट मामले का संज्ञान ले सकता था, पर वह भी इस अंधेरगर्दी पर मौन है।
पीएम मोदी ने देश भर में लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने और आदर्श चुनाव आचार संहिता (MCC) लागू होने के बावजूद मनरेगा की मजदूरी दर बढ़ाने का ऐलान किया है।
इसको लेकर केंद्र की मोदी सरकार की ओर से एक नोटिफिकेशन जारी किया गया है। जिसके मुताबिक, नए वित्तीय साल के लिए मनरेगा की मज़दूरी दर को राज्यों में 3.04% से 10.44% तक बढ़ाया गया है. नई मज़दूरी दर (New MGNREGA Wage Rates) 1 अप्रैल, 2024 से लागू होगी।
बताया जा रहा है कि सरकार ने इसकी घोषणा के लिए चुनाव आयोग से अनुमति पहले ही ले ली थी। चुनाव आयोग ने बिना देर लगाए सरकार को इसकी घोषणा करने की अनुमति भी दे दी। चुनाव आयोग की तेजी और सरकार की इस घोषणा को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सोशल मीडिया पर केंद्रीय चुनाव आयोग को 'केंचुआ' कह कर उसकी थू-थूी की जा रही है। सवाल उठाया जा रहा है कि यह सीधे तौर पर मतदाताओं को आर्थिक लाभ देने का मामला है, तो चुनाव आयोग इसकी अनुमति कैसे दे सकता है?
बताया जा रहा है कि मोदी सरकार ने मनरेगा मजदूरी में 7 रुपये से 30 रुपये तक की बढ़ोतरी की घोषणा कांग्रेस के दबाव में की है। क्योंकि, कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में श्रमिक न्याय गारंटी नाम से वादा किया है कि उसकी सरकार अगर आती है तो न्यूनतम मजदूरी 400 रुपये की जाएगी।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने गुरुवार को इस मुद्दे पर टिप्पणी भी की है। जयराम रमेश ने मनरेगा मजदूरी बढ़ने की अधिसूचना जारी होने के बाद कहा- मोदी सरकार ने 2024/25 के लिए मनरेगा मजदूरी दर में संशोधन किया है। नई दरें 1 अप्रैल से लागू होंगी। यह आगामी चुनावों के मद्देनजर आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है। हालांकि इस बढ़ोतरी के बावजूद सरकार द्वारा सभी राज्यों के लिए घोषित दैनिक मजदूरी की दरें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के श्रमिक न्याय गारंटी के तहत घोषित 400 रुपए प्रति दिन से बेहद कम है।
लोग सवाल कर रहे हैं कि इसी चुनाव आयोग ने बीते दिनों में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान 30 नवंबर को होने वाले मतदान से पहले सोमवार (27 नवंबर) को तेलंगाना में सत्ताधारी भारत राष्ट्र समिति (BRS) सरकार की महत्वकांक्षी योजना 'रायथु बंधु (Rythu Bandhu)' के तहत रबी फसलों के लिए किसानों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता की किस्त बांटने पर रोक लगा दी।
पुरानी सरकारी योजना के तहत तेलंगाना के किसानों को पूर्व निर्धारित राशि देने से रोकने वाला चुनाव आयोग अब मोदी को मनरेगा मजदूरी बढ़ाने की इजाजत कैसे दे रहा? यह सवाल राजनीतिक दलों द्वारा और सोशल मीडिया पर उठाते हुए लोग चुनाव आयोगी को मोदी सरकार की पालतू संस्था बता रहे हैं।
इसके अलावा लोग 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद मोदी द्वारा चुनावी सभाओं में पुलवामा में मारे गए जवानों के नाम पर वोट मांगे जाने का वीडियो भी शेयर करके कह रहे हैं कि सरकार का पालतू चुनाव आयोग उस समय भी हाथों में चूडि़यां पहने बैठा था।
गुजरात चुनाव के बीच भी मोदी सरकार ने सूरत के हीरा कारोबारियों को खुश करने के लिए उन्हें जीएसटी में भारी राहत देने का ऐलान किया था। पिलपिला चुनाव आयोग उस समय भी मुंह में दही जमाए बैठा था।
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनावी सभा करने के लिए मोदी हेलीकॉप्टर से ओडिशा के संबलपुर गया था, तब उसके हेलीकॉपटर से एक बड़ा सा बक्सा उतारा गया था, जिसमें वोटरों को बांटे जाने के लिए दो हजार के नोट भरे होने की बात कही जाती है।
निर्वाचन आयोग के एक आईएस स्तर के अधिकारी मोहम्मद मोहसिन ने इस बक्से को खोलकर तलाशी का निर्देश दिया था, पर मोदी की सुरक्षा में लगे एनएसजी अधिकारियों ने उस अधिकारी को बक्सा खोल कर दिखाने से साफ इनकार कर दिया था।
उस वक्त इस गंभीर मामले का संज्ञान लेने के बजाय चुनाव आयोग ने उस अधिकारी को ही कार्यवाही करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया था। बाद में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल यानी कैट ने इस निलंबन पर रोक लगा दी थी।

0 टिप्पणियाँ
आपकी टिप्पणियों, प्रतिक्रियाओं व सुझावों का स्वागत है, पर भाषा की गरिमा और शब्दों की मर्यादा अवश्य बनाए रखें.