संसद में शेर ओ शायरी के साथ अपनी बाते रखने के लिए मशहूर सांसद डॉ अमोल कोल्हे एक बार फिर से अपनी एक कविता के लिए चर्चा में हैं। संसद के बजट सत्र के दौरान ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उनके द्वारा पढ़ी गई कविता सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है।
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सोशल मीडिया पर भी एनसीपी सांसद का यह वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह लोकसभा में बोलते हुए कविता पढ़ रहे हैं इस कविता में उनकी जमकर तारीफ भी हो रही है।
एनसीपी नेता ने संसद के बजट सत्र के दौरान ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उन्होंने राम मंदिर और सरकार के वादे को जोड़ते हुए कविता पढ़ी है। इस कविता में राम मंदिर, महंगाई, रोजगार, निजीकरण आदि को लेकर कई सवाल उठाए।
कोल्हे ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान यह कहा है कि मैं पूरे देश को मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री रामलला के आगमन के लिए बधाई देता हूं। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी कविता में केंद्र सरकार पर तंज कसा है।
कविता की पंक्तियों में कहा गया है कि तीन मंजिली 490 और 32 सीढ़ियां जय श्री राम का नारा लगाते हुए हम सीढ़ियां चढ़ने लगे। राम लाला से क्या गुहार लगाएं ये सोचने। पहली सीढ़ी पर याद आई महंगाई दूसरी सीढ़ी पर बेरोजगारी तीसरी सीढ़ी पर पत्रकारिता की चरण चुंबकता और चौथी पर केंद्रीय एजेंसी की संबंधित भूमिका हर सीढ़ी पर कुछ ना कुछ याद आ रहा था। डॉ. कोल्हे की पूरी कविता इस प्रकार है-
जब रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की बात आई,
तो किसी ने कहा बिना कलश के प्राण प्रतिष्ठा कैसे होगी?
किसी ने कहा जब चुनाव ही प्राण हो,
तो सोचो कौन सी प्रतिष्ठा दांव पर लगी होगी?
लोग तो कुछ कहेंगे, लोगों का काम है कहना
आप जन की बात मत सुनना, सिर्फ मन की बात करना
फिर भी खुश थे हम
500 साल का सपना जो पूरा हो रहा था
हमारे अंदर का हिंदू भी पूरी तरह से जाग गया था
तो चल पड़े अयोध्या की ओर रामलला के दर्शन की आस लगाए
जो सामने नजारा देखा वो देखकर दंग रह गए
वो तीन मंजिलें, 400 खंभे, 32 सीढ़ियां
जय श्रीराम का नारा लगाते हुए हम सीढ़ियां चढ़ने लगे
रामलला से क्या गुहार लगाएं ये सोचने लगे
पहली सीढ़ी पर याद आई महंगाई
दूसरी पर देश में बढ़ती बेरोजगारी
तीसरी पर पत्रकारिता की चरण चुंबकता
चौथी पर सेंट्रल एजेंसीज की संदिग्ध भूमिका
हर सीढ़ी पर कुछ न कुछ याद आ रहा था
कहीं 15 लाख का जुमला, कहीं किसानों का आक्रोश था
कहीं महिला कुस्तिगिरों की वेदना थी,
कहीं सालाना दो करोड़ रोजगारों का वादा था
कहीं बढ़ती सांप्रदायिकता थी
तो कहीं चुनिंदा पूंजीपतियों पर मेहरबान हमारी सरकार का चेहरा था
इस वास्तविकता के झंझोड़ने के बाद भी हम अंधभक्तों की तरह चलते गए
होश तो तब संभाला जब रामलला के दर्शन हुए
हमें नतमस्तक देख रामलला मुस्कुराते हुए बोले
मैं कल भी था, आज भी हूं, कल भी रहूंगा
जितना इस मंदिर में हूं, उतना ही तुम्हारे मन में रहूंगा
लेकिन याद रखना हमेशा, मैंने त्रेतायुग में रामराज्य लाया था
तुम कलयुग में जीते हो जहां संविधान ने गणराज्य लाया है
धर्म समाज का किनारा जरूर है लेकिन देश एक बहती धारा है
किनारे को धारा के बीच में लाया
तो प्रवाह अड़ जाता है, प्रगति के पथ से हट जाता है
इसलिए धर्म का ठेकेदार नहीं, पहरेदार बनना चाहिए
तुम रहो न रहो, वो रहे न रहे, ये देश रहना चाहिए,
देश का संविधान रहना चाहिए, देश का लोकतंत्र रहना चाहिए,
ये देश, देश रहना चाहिए

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