देश के पूर्वोत्तर में बांस के जंगल और बांस की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. बेहद कम लागत और देखभाल के बावजूद काफी लाभाकारी होने के कारण विशेषज्ञ इसे किसानों (Farmers) के लिए ‘हरा सोना’ कहते हैं.
बांस की इस उपयोगिता को देखते हुए अब मध्य प्रदेश सरकार ने भी राज्य में बांस की खेती को बढ़ावा देने की कोशिश शुरू कर दी है.
राज्य में इसकी खेती करने पर किसानों को प्रति पौधा 120 रुपये की मदद दी जा रही है. तीन साल में औसतन 240 रुपये प्रति प्लांट की लागत आती है. यानी आधा पैसा सरकार देगी.
किसान सरकारी नर्सरी से बांस के पौधे खरीद सकते हैं. एक हेक्टेयर में बांस के 625 पौधे लगाए जा सकते हैं. इसे एक बार लगाने के बाद कई साल तक इसका उत्पादन प्राप्त होता है. यह किसी भी मौसम में खराब नहीं होता.
मध्य प्रदेशबांस मिशन के सीईओ डॉ. यूके सुबुद्धि ने बताया कि राज्य बांस मिशन योजना में किसानों द्वारा निजी भूमि पर बांस रोपण किया जाता है. रोपित बांस के पौधों के लिए 3 वर्ष में 120 रुपये प्रति पौधे की दर से किसानों को अनुदान दिया जाता है.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बांस की खेती किसानों का रिस्क कम करती है. क्योंकि किसान बांस के पौधों के बीच दूसरी फसलें भी उगा सकते हैं.
बांस की 136 प्रजातियां हैं, लेकिन 10-12 काफी प्रचलित हैं. किसान भाई अपनी सहूलियत के हिसाब से प्रजाति का चयन कर सकते हैं.
पहले बांस काटने पर किसान भाईयों पर फॉरेस्ट एक्ट लगता था. एफआईआर होती थी. किसानों की इस दिक्कत को देखते हुए सरकार ने इसे पेड़ की लिस्ट से हटवा कर घास की श्रेणी में करवा दिया है. इसलिए अब निजी जमीन पर लगाए गए बांस को काटने पर कोई केस नहीं होगा.
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