गुरु-शिष्य व परिवार, तीनों को समझना होगा, पैसे से ज्‍यादा जरूरी है संस्कार

  • शिक्षक दिवस (5 सितंबर) पर विशेष आलेख

पहले एमबीए, बीटेक आदि में लगभग सभी छात्र सामान्य से कुछ ऊपरी वर्ग के परिवारों से ही आते थे। उनमें हर वक्त स्मार्ट बने रहने की ललक भी दिखती थी, यह ललक अब भी दिखती है, लेकिन इसी में कुछ ऐसे भी आते हैं, जो अभाव में जिंदगी गुजारकर भी अच्छी पढ़ाई के लिए लालायित रहते हैं। इसी तरह का एक हमारा शिष्य था योगेश। जहां दूसरे विद्यार्थी कार, मोटरसाइकिल से आते थे, वहीं वह साइकिल से आता था। क्लास में हमेशा प्रश्न पूछने की जिज्ञासा बनी रहती थी। उसके सामान्य वेष-भूषा पर दूसरे लड़के उसको कभी-कभार चिढ़ाते भी थे, लेकिन जब रिजल्ट आया, तो उसने पूरे क्लास में टॉप किया। पढ़ाई के प्रति उसकी जिज्ञासा देखकर मैं क्लास से इतर उसे घर पर भी पढ़ाती थी। बाद में उसने पूरी फेकेल्टी में टॉप किया। 

स्‍वाति सिंह 

यह योगेश की हकीकत मात्र एक उदाहरण है। 2001 से एक दशक तक लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य के अनुभवों के आधार पर यह कह सकती हूं कि शिक्षा का स्वभाव “अभाव” है। यदि अभाव की अनुभूति नहीं हुई तो आगे बढ़ने व शिक्षा में ध्यान केन्द्रित करने की ललक भी मर जाएगी। सभ्यता व सुसंस्कृति की शिक्षा भी ज्यादातर अभाव में ही मिलती है, जिसकी आज बहुत जरूरत है। यदि शिक्षा ग्रहण करते समय शिष्य खुद को राजा समझे, तो वह कभी गुरु की शरण में नहीं रह सकता। ऐसे में उसके मन में हमेशा धन का घमंड रहेगा। यदि उसमें धन का घमंड रहा, तो वह कभी शिक्षक के कही बात को अपने मन में नहीं उतार सकता। इसी कारण तो गुरुकुल परंपरा बनी थी। जहां राजा दशरथ के पुत्र आदर्श भगवान श्रीराम भी आश्रम में जाकर ही शिक्षा ग्रहण किये। आश्रम में रहते हुए जंगलों की लकड़ियां बिनकर हमेशा आश्रम के भोजन की व्यवस्था करते रहे। क्या राजा दशरथ अपने घर में पढ़ाने की व्यवस्था नहीं कर सकते थे, लेकिन घर में वह अभाव की अनुभूति नहीं हो सकती। यदि अभाव की अनुभूति नहीं होगी तो स्वभाव में परिवर्तन नहीं हो सकता। स्वभाव को संस्कारवान बनाने के लिए अभाव की अनुभूति जरूरी है।

आज बदलते समय में यह जरूरी हो गया है कि बच्चों को किताबी ज्ञान से पूर्व ही संस्कार का ज्ञान दिया जाए। यदि बच्‍चा संस्कारवान व ज्ञानी बनेगा, तो वह कभी दुखी नहीं रह सकता। अभावों में भी वह परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता रखेगा। सामाजिकता यदि रहेगी, तो वह हमेशा जिंदादिल रह सकता है, वरना अभावों के समय वह तुरंत निराशा में चला जाएगा। यह शिक्षा परिवार को व गुरु को दोनों को निभानी पड़ेगी, वरना आने वाली पीढ़ी अर्थवान हो सकती है, लेकिन संस्कारवान नहीं और संस्कार के बिना अर्थ बेमतलब सिद्ध होता है। 

यदि आपने अपने बुढ़ापे की लाठी के रूप में अपने पुत्र को धनवान बना ही दिया और वह लाठी बनकर आप पर टूट पड़े तो फिर वह संस्कार विहीन शिक्षा का क्या औचित्य। इसे आज बहुत जरूरी है समझना। 

पहले के लोगों को याद होगा, बच्चों की पुस्तकों में एक नैतिक शिक्षा की भी किताब होती थी। उसके पीछे कहानियों के माध्यम से बच्चों में संस्कार डालना उद्देश्य था। हकीकत भी है, उसका असर भी होता है। पहले दादा-दादी का भी एक महत्वपूर्ण काम हुआ करता था, बच्चों को अच्छी कहांनियां सुनाना। वह भी बच्चों को संस्कारयुक्त बनाने में महती भूमिका निभाते थे, लेकिन आज हम अच्छे स्कूलों में दाखिला कराकर अपने कर्तव्यों का इतिश्री कर लेते हैं। हमारे पास बच्चों को वक्‍त देने के लिए समय का ही अभाव रहता है या समय रहने पर भी हम समय नहीं दे पाते। जब हम अपने बच्चे को समय नहीं दे पाते, ऐसे में हम स्कूल में सैकड़ों बच्चों के साथ अध्यापक द्वारा पर्याप्‍त समय दे पाने की बात कैसे सोच सकते हैं।

अब देखिये न, 31 अगस्त को झारखंड के दुमका के गांव में छात्रों अपने गुरु को पेड़ में बांधकर इस कारण पीटा, क्योंकि उन्होंने प्रैक्टिकल में कम नम्बर दिये थे। यही नहीं, इसका विधिवत विडियो भी बनाया, जिसमें कहते हुए सुने जा रहे थे कि इसे वायरल करना है। यह सवाल सिर्फ क्राइम का नहीं है। यह सवाल संस्कारों का है, जो गिरता जा रहा है। ऐसे में क्या वे शिष्य कभी वैसे गुरु से पढ़ पाएंगे, क्या ऐसे शिष्यों के सामने कभी गुरु की गुरुता प्रकट हो सकती है? वे खुलकर कभी पढ़ा सकते हैं? ऐसी परिस्थिति में तो अध्यापक भी केवल अपनी औपचारिकता पूरी करने और वेतन लेने तक सीमित हो जाएगा। यह तो मात्र एक उदाहरण है। कुछ ऐसी परिस्थितियां कई बार बन जाती हैं, जिससे गुरु-शिष्य की परंपरा ही समाप्त प्राय हो जाती है। न गुरु पढ़ा पाता है और न ही शिष्य पढ़ता है। दोनों अपनी-अपनी औपचारिकताएं पूरी कर चलते बनते हैं।

इस तरह से गुरु और शिष्य के बीच बढ़ते दुराव के लिए कोई एक दोषी नहीं है। इसके लिए दोनों दोषी हैं। अपने अनुभवों के आधार पर कह सकती हूं कि अर्थ के युग ने संस्कृति का ह्वास कर दिया है। अधिकांश मां-बाप अच्छे स्कूल में भेजकर, अच्छी फीस जमाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। न बच्चों के बदलते व्यवहार पर कभी ध्यान देते हैं और न ही उनके अध्यापकों से जाकर मिलना पसंद करते हैं। इससे बच्चे भी मनमाने होने लगते हैं। इसी के लिए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार संस्कार युक्त शिक्षा पर जोर देते हैं।

संस्कार और उच्च गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने के लिए तो राज्यपाल का प्रदेश सदा आभारी रहेगा। मैं जहां तक देखती हूं, उच्च शिक्षा विभाग की जब भी बैठक होती है, चाहे व किसी मुद्दे पर हो, बच्चों में संस्कार युक्त शिक्षा देने की बात करना राज्यपाल नहीं भूलतीं। उनके आने के बाद तो उप्र के विश्वविद्यालयों को कायाकल्प ही हो गया। उन्हीं के आने का नतीजा रहा कि कभी नैक मूल्यांकन कराने से भी दूर रहने वाला लखनऊ विश्वविद्यालय आज A++ के साथ प्रदेश के सर्वोच्च विश्वविद्यालयों में शुमार हो गया है।

इस अर्थ के जमाने में गुरु-शिष्य व परिजन तीनों ही को संस्‍कारों के महत्‍वप को समझना होगा। मैं अर्थयुग की विरोधी नहीं हूं। बदलते जमाने के साथ बदलाव भी जरूरी है, लेकिन यदि हम अपनी भाषा व सभ्यता को छोड़ दूसरों का नकल करें। जब हम खुद की अच्छाई को समेटे हुए दूसरों की अच्छाई को भी अपने में समाहित करते हैं, तब तो हम प्लस करते हैं। हमें प्लस करने यानी जोड़ने पर विचार करना होगा। अपनी संस्कृति का ज्ञान बच्चों में कराना होगा। गुरु को भी बच्चों के सामने अर्थ नहीं, गुरु-शिष्य परम्परा को अपनाना होगा। उसके सामने यह दिखाने की जरूरत होगी कि वे हर कदम पर अपने शिष्य के साथ हैं। परिवार के सदस्यों को भी अपने बच्चों को एहसास कराना होगा कि गुरु से शिक्षा तभी ग्रहण की जा सकती है, जब उसकी शिष्यता ग्रहण की जाए।

(लेखिका- उत्‍तर प्रदेश सरकार में  कैबिनेट मंत्री रही हैं व लखनऊ विश्वविद्यालय में  एक दशक तक अध्यापन का कार्य कर चुकी हैं।)

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