
खाद्य तेल की लगातार कई माह से ऊंची कीमतों में नरमी लाने के लिए केंद्र सरकार ने पाम ऑयल पर आयात शुल्क में कटौती की है, पर इससे तेल की महंगाई घटने को लेकर संशय बना हुआ है.
तेल कारोबार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के इस कदम के बाद भी कई ग्लोबल कारणों सेघरेलू स्तर पर खाद्य तेलों की कीमतों में ज्यादा गिरावट नहीं आएगी.
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कीमतों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि खाद्य तेलों में तेजी की असल वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में पर तिलहन फसलों के उत्पादन में गिरावट है.
दुनिया के प्रमुख तिलहन उत्पादक देशों में फसल इस बार कमजोर रहने के कारण मांग और आपूर्ति में काफी अंतर लगातार बना हुआ है.
ब्राजील और अमेरिका में सूखे के कारण सोयाबीन की आपूर्ति घटी है. दूसरी ओर पाम ऑयल का इस्तेमाल बायो फ्यूल बनाने होने के चलते उसकी उपलब्धता भी घट गई है. इससे ग्लोबल स्तर पर कीमतों में तेजी बनी हुई है.
विशेषज्ञ बताते हैं कि ग्लोबल बाजार में तिलहन की आपूर्ति कम रहने की वजह से ही इस बार भारत में सरसों की बंपर उपज होने के बावजूद उसकी कीमतें ऊंची बनी हुई हैं.
बता दें कि तेल की कीमतें घटाने के लिए केंद्र सरकार ने खाद्य तेल के उत्पादन में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले कच्चे पाम ऑयल पर आयात शुल्क की ( दर बीते बुधवार को 15 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दी है.
इस कटौती के बाद कच्चे पाम तेल पर 10 फीसदी मूल आयात शुल्क के साथ उपकर और अन्य शुल्कों को मिला कर प्रभावी आयात शुल्क अब 30.25 फीसदी हो गया है.
इसके अलावा रिफाइंड पाम ऑयल पर आयात शुल्क 49.5 फीसदी से घटाकर 41.25 फीसदी कर दिया गया है. शुल्क की दरों में यह कटौती 30 जून से प्रभावी हो गई है, जोकि 30 सितंबर तक लागू रहेगी.
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