
पानी में खारेपन और जलभराव की समस्या देश के कई इलाकों में पाई जाती है। किसानों को इसका खमियाजा उन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है, जहां खेती भूमिगत यानी ट्यूबवेल से सिंचाई पर निर्भर होती है.
ऐसे क्षेत्रों के किसान केरल में उगाई जाने वाली धान की पोक्कली प्रजाति की खेती कर सकते हैं, जिसे खारे पानी में भी किया जा सकता है।
पोक्कली धान अपने खारे जल के प्रतिरोध के लिये प्रसिद्ध है। इसका उत्पादन मुख्य रूप से केरल के तटीय ज़िलों अलप्पुझा, एर्नाकुलम व त्रिशूर आदि में किया जाता है।
इसकी खेती जून से नवम्बर के बीच खारे पानी के खेतों में की जाती है और फसल कटाई के बाद इन्हीं खेतों में मछली और झींगा पालन भी किया जाता है। जिससे किसानों का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है।
मत्स्य मल (excreta) व अवशेषों (Scales) और धान की ठूंठ अगले मौसम में धान की खेती के लिये अच्छी प्राकृतिक खाद का काम भी करती है।
पोक्कली चावल अपने विशिष्ट स्वाद और अत्यधिक मात्रा में प्रोटीन के लिये जानी जाती है। अधिक एंटीऑक्सिडेंट और कम कार्बोहाइड्रेट इसे मधुमेह रोगियों के लिये अत्यधिक उपयोगी बनाते हैं।
चावल की इस किस्म को जी.आई. टैग प्राप्त है। स्थानीय लोग धान की इस किस्म को औषधीय गुणों से युक्त मानते हैं।
हाल ही में 'अम्फान' चक्रवात के कारण पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में अधिकतर धान के खेतों में समुद्री खारे जल के भराव की वजह से पश्चिम बंगाल के दक्षिणी 24 परगना ज़िले के किसान पोक्कली की वाईटिला-11 किस्म के धान की रोपाई कर रहे हैं।
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